महाराष्ट्र की राजनीति में किंगमेकर की भूमिका कब निभा सकेगी ‘मनसे’?||Raj thakre needs magic to revive MNS in upcoming assembly elections 2019 in maharashtra – News18 हिंदी

महाराष्ट्र नवनिर्वाण सेना के सुप्रीमो राज ठाकरे की राजनीति इन दिनों गर्दिश में चल रही है. राष्ट्रवाद के सामने उनका अति क्षेत्रवाद फीका पड़ता नजर आ रहा है. यही वजह है कि जो महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना 2009 में 13 विधानसभा सीटें जीत पाने में कामयाब रही थी वो साल 2014 में महज एक सीट पर सिमट गई थी .

वैसे भी राज ठाकरे की राजनीति मुंबई और महाराष्ट्र के अन्य हिस्सों में उत्तर भारतीय के खिलाफ रही है. मनसे के कार्यकर्ता कई बार मुंबई में उत्तर भारतीय लोगों के खिलाफ सड़क पर हिंसक होते दिखाई पड़े हैं. साल 2008 में तो राज ठाकरे ने यूपी और बिहार की तथाकथित दादगिरी के खिलाफ आंदोलन छेड़ा था जो कि मुंबई में हिंसात्मक हो चुका था . आरोप है कि करोड़ों की संपत्ती का इसमें नुकसान हुआ था लेकिन राज ठाकरे को महज 15 हजार के जुर्माने पर छोड़ दिया गया था.

राज ठाकरे उग्र क्षेत्रियता की राजनीति कर शुरू में चमकते नजर आए और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की राजनीतिक पैठ मराठी लोगों में थोड़ी असरदार दिखने लगी. आलम ये रहा कि साल 2009 में शिवसेना के वोटों में सेंधमारी कर पाने में कामयाब रहे राजठाकरे अपने सिर पर जीत का सेहरा तो नहीं बांध पाए लेकिन कांग्रेस और शरद पवार की पार्टी नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी की सरकार बनवा देने में उनकी अहमियत भी कम नहीं रही. बीजेपी और शिवसेना के वोटों में बिखराव हुआ और परिणाम स्वरूप बीजेपी शिवसेना विरोधी गठबंधन सरकार बनाने में कामयाब रहा.

विधानसभा की 13 सीटों से 1 सीट पर सिमटी ‘मनसे’

साल 2009 में राज ठाकरे की पार्टी 13 सीटों पर चुनाव जीतने में कामयाब रही लेकिन उत्तर भारतीय के खिलाफ राज ठाकरे की राजनीति उन्हें साल 2014 में महज 1 विधायक वाली पार्टी की हैसियत में लाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी.

साल 2014 के विधानसभा चुनाव के बाद प्रदेश की राजनीति में लगभग हाशिए पर धकेल दिए गए राज ठाकरे अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने के लिए बीजेपी विरोधी तमाम पार्टी के साथ हाथ मिलाने की पुरजोर कोशिश करते रहे हैं. लेकिन कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी और नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी इस बात से भली भांती वाकिफ है कि राज ठाकरे के साथ खुले आम हाथ मिलाना प्रदेश ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में भी उसे किस तरह नुकसान पहुंचा सकता है.

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साल 2006 में शिवसेना से अलग हुए राज ठाकरे ने महाराष्ट्र नव निर्माण सेना का गठन किया था तब लोगों की निगाहें इस ओर थी कि बाला साहब ठाकरे के वारिस के तौर पर राज ठाकरे राजनीति में सफल होने की खूबियां ज्यादा रखते हैं. लेकिन पिछले 13 सालों में उनकी राजनीति मुंबई और उसके बाहर कुछ इलाकों में  अपना असर खोती चली गई.

ऐसे में साल 2019 विधानसभा का चुनाव उनके राजनीतिक भविष्य पर छा रहे घने अंधेरे को साफ करने में कामयाब हो पाएगा या नहीं इस पर निगाहें सबकी बनी रहेगी.

कई विवादों से रहा है नाता

राज ठाकरे पर एक हत्या का आरोप भी लगा था.दरअसल, उनके बचपन के दोस्त रहे लक्ष्मीकांत शाह के मकान का किराएदार लक्ष्मीकांत शाह का मकान खाली नहीं कर रहा था. बाद में किन्नी नाम के किराएदार का शव पुणे एक थिएटर के पास मिला था.जिसकी मौत की जांच  सीबीआई को सौंपी गई थी और  सीबीआई ने अपनी जांच में किन्नी की मौत को आत्महत्या करार दिया था.

राज ठाकरे का नाम कोहिनूर मिल विवाद में भी उछला था जब साल 2005 में शिवसेना दफ्तर के पास दादर में पांच एकड़ की जमीन राज ठाकरे और पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मनोहर जोशी के पुत्र उन्मेश जोशी द्वारा खरीदे जाने की बात सार्वजनिक हुई थी.  राष्ट्रीय क्रांतिकारी पार्टी के नेता सचिन अहिर ने आरोप लगाया था कि उस जमीन के लिए 40 से ज्यादा कंपनियों ने बोली लगाया था लेकिन महज 3 कंपनियों के नाम सूचिबद्ध किए गए इसलिए उस जमीन की बोली फिर से लगाई जानी चाहिए.

पिछले दिनों 22 अगस्त को इनफोर्समेंट डायरेक्टरेट ने कोहिनूर स्कवायर टावर को डेवलप करने को लेकर मनी-लॉन्डरिंग के आरोप के तहत राज ठाकरे को पूछताछ के लिए अपने दफ्तर में बुलाया था जिसको लेकर राज ठाकरे और उनके समर्थक केंद्र सरकार पर बदले की राजनीति कर विपक्ष को डराने और धमकाने का आरोप लगाया जिसकी चर्चा कई अखबारों की सूर्खियां रही.

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सामाजिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि

राज ठाकरे का जन्म साल 1968 में हुआ है और वो उद्धव ठाकरे के चचेरे और मौसरे भाई दोनों हैं. राज ठाकरे बाल साहब ठाकरे के छोटे भाई श्रीकांत केशव ठाकरे के पुत्र हैं और उनका असली नाम स्वराज ठाकरे है. राज को फिल्म,कार्टून बनाने का बेहद शौक है और अगर राजनीति में वो नहीं आते तो निर्देशन पर उनका जोर होता . राज के पिता भी उर्दू की शायरी,फिल्म और संगीत में खासा रूचि रखते थे वहीं राज की पत्नी शर्मिला प्रसिद्ध मराठी फिल्मकार ,निर्माता ,निर्देशक मोहन बाघ की बेटी हैं.

राज का पर्यायवरण से भी खासा लगाव है . इस कड़ी में उन्होंने साल 2003 में 76 लाख पेड़ लगाने का अह्वान किया था लेकिन वो पूरा नहीं हो सका था. राज ठाकरे पहाड़ी क्षेत्र पुणे में आबादी बसाने के खिलाफ भी मुखर रहे हैं वहीं साल 1996 में मराठी लोगों को उद्योग लगाने को लेकर शिव उद्योग सेना का गठन किया था जिसका उद्देश्य रोजगार के लिए मराठी लोगों को कर्ज देना था. राज ठाकरे इस कड़ी में माइकल जैक्सन का एक प्रोग्राम भी आयोजित कराया था जिसका उद्देश्य संगठन के लिए पैसे इकट्ठा करना था.

फिलहाल राज ठाकरे के सामने राजनीतिक वजूद को लेकर चिंता है. वो साल 2014 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के समर्थक रहे हैं लेकिन साल 2019 लोकसभा चुनाव में उन्होंने मोदी का पुरजोर विरोध किया और मोदी और शाह को किसी भी हालत में हराने पर जोर दिया. साल 2019 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी मैदान में नहीं थी परंतु राज बीजेपी शिवसेना के खिलाफ प्रचार में काफी सक्रिय थे. आने वाले विधानसभा चुनाव में राज की पार्टी का गठबंधन फिलहाल किसी भी मुख्य पार्टी से हो नहीं पाया है .ऐसे में 13 से 1 विधायक पर पहुंच चुकी पार्टी एमएलए की संख्या में इजाफा कर पाएगी या फिर खाता खोलने को भी मोहताज रहेगी इस पर निगाहें राजनीतिक पार्टियां समेत राजनीतिक पंडितों की भी रहेगी.

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Tags: Maharashtra, Maharashtra Assembly Election 2019, MNS, Raj thackeray

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