Crpf: Why Young Officers Leaving The Force, Lack Of Recognition And Promotion Could Be A Reason – Crpf: बल को अलविदा कह रहे युवा अफसर, पहचान और पदोन्नति का न मिलना बन रही छोड़ने की वजह

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नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में माओवादियों के ठिकाने पर पहुंच कर उन्हें तबाह करना, जम्मू-कश्मीर में आतंकियों के खिलाफ रोजाना हो रहे ‘ऑपरेशन’ और उत्तर-पूर्व में उग्रवादियों पर नकेल कसना, इन सभी में सीआरपीएफ के जांबाज ग्राउंड कमांडरों की अहम भूमिका है। इसके बावजूद केंद्र सरकार, इनके साथ सौतेला व्यवहार कर रही है। नतीजा, सीआरपीएफ के युवा अफसर, आठ-दस साल बाद फोर्स को अलविदा कह रहे हैं। पिछले 5/6 साल में 150 से अधिक सीधे नियुक्त राजपत्रित अधिकारियों ने नौकरी छोड़ दी है। हैरानी की बात तो ये है इन अधिकारियों को अपने हितों के लिए सर्वोच्च अदालत का सहारा लेना पड़ रहा है। ‘पहचान और पदोन्नति’ के मामले, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। कई मामले तो ऐसे हैं, जो कोर्ट की अवमानना के लिए दायर किए गए हैं। केंद्र सरकार ने अदालत के आदेश के बावजूद, ‘संगठित सेवा’ का दर्जा देने जैसे कई फैसलों को जानबूझकर लागू ही नहीं किया।

कमांडरों को इसलिए काटने पड़े अदालतों के चक्कर

कुछ दिन पहले ही सेवा को अलविदा बोल चुके सहायक कमांडेंट सर्वेश त्रिपाठी बताते हैं, सीआरपीएफ व दूसरे बलों में सीधे नियुक्त राजपत्रित अधिकारियों को कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। बात केवल पदोन्नति या दूसरे आर्थिक फायदों की नहीं है। यहां तो ‘पहचान’ के लिए लड़ना पड़ रहा है। सीएपीएफ में मेडिकल कैडर, मिनिस्ट्रियल और यहां तक की वेटनरी डॉक्टर को भी समय पर पदोन्नति मिल जाती है, मगर एग्जीक्यूटिव कैडर के साथ हर मामले में भेदभाव होता है। सीआरपीएफ के एमटेक, बीटेक, आईआईटी व दूसरी डिग्री हासिल किए अधिकारियों को पदोन्नति से वंचित रखा जा रहा है। पॉलिसी के मोर्चे पर सरकार के निर्णय ठीक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने संगठित सेवा ‘ओजीएएस’ देने का आदेश दिया। तत्कालीन केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने यह घोषणा करने के लिए बाकायदा प्रेसवार्ता की थी। केंद्रीय कैबिनेट ने नोटिफाई किया, लेकिन आज तक लागू नहीं किया गया। जब ये नहीं हुआ तो नए सर्विस रूल्स भी नहीं बने। ऐसे में एग्जीक्यूटिव कैडर को पदोन्नति कैसे मिल सकती है। ये अलग बात है कि केंद्र सरकार ने 2019 के लोकसभा चुनाव में ‘ओजीएएस’ देने के मुद्दे को खूब भुनाया था।  

‘पहचान’ के लिए अदालत में जाना पड़ा …  

हर सर्विस का एक नाम होता है। संबंधित कैडर अधिकारी उससे पहचाने जाते हैं। हैरानी की बात तो ये है कि सीआरपीएफ के युवा अधिकारियों को इसके लिए भी अदालत जाना पड़ा। चूंकि ये क्लास वन अधिकारी हैं, इसलिए अपनी सेवा का एक नाम चाहते हैं। आखिर ये किस सेवा में हैं, यह पता होना चाहिए। जैसे अखिल भारतीय सेवा में रेवेन्यू सर्विस, इंजीनियरिंग सर्विस या रेलवे की कई सेवाएं, सीआरपीएफ का भी एक ऐसा ही नाम चाहते थे। इसके लिए दिल्ली हाईकोर्ट में जाना पड़ा। केस अभी तक चल रहा है।  

आरपीएफ और सीआरपीएफ का एक जैसा ही केस था। आरपीएफ को आईआरपीएफएस नाम दे दिया गया। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सीआरपीएफ को नाम नहीं दिया। पुरानी पेंशन व्यवस्था भी अब खत्म हो चुकी है। करियर प्रोग्रेसन की स्थिति बहुत खराब है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी संगठित सेवा का दर्जा न मिलना और न ही एनएफएफयू को सही तरीके से लागू करना, इन सभी में सरकारी की मनमानी रही है। सीनियर्स द्वारा गैर जरूरी दबाव डाला जाता है। बल में साथ काम कर रहे मेडिकल कैडर और मंत्रालयिक शाखा के अधिकारियो को तुलनात्मक रूप से तेज प्रमोशन मिल रहा है। हर छोटे देय भत्ते जैसे एचआरए, टीए आदि के लिए न्यायालय की शरण में जाना पड़ रहा है।

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इन जांबाजों ने उठाई हक के लिए आवाज

सेवा का नाम, बैच का निर्धारण, सरकार ने इस बाबत कोई निर्णय नहीं लिया। सर्वेश त्रिपाठी बनाम भारत सरकार, ये मामला अदालत में चल रहा है। स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एचआरए के लिए भी अधिकारियों को कोर्ट की शरण लेनी पड़ी। गौरव सिंह बनाम भारत सरकार, यह केस अदालत में पहुंचा है। नॉन फंक्शनल सेलेक्शन ग्रेड (एनएफएसजी) के लिए करुणा निधान बनाम भारत सरकार, यह अवमानना का केस दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष विचाराधीन है। गैर-कार्यात्मक वित्तीय उन्नयन (एनएफएफयू) के केस में अदालत की अवमानना, यह केस भी सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है। ओजीएएस यानी संगठित सेवा का मामला भी अदालत में है।

सीआरपीएफ में डॉक्टरों को तेज पदोन्नति और एग्जीक्युटिव अधिकारियों को कछुआ गति से आगे बढ़ाना, ये केस अदालत के समक्ष है। आरोप है कि डॉक्टरों को टाइम बाउंड पदोन्नति मिल रही है। वे एक समय के बाद मनमर्जी से रैंक लगा लेते हैं। रणजीत सिंह बनाम भारत सरकार, ये केस अदालत में है। कैडर अधिकारियों का कहना है कि मिनिस्ट्रयल स्टाफ को क्लास वन अधिकारी बना रहे हैं वो भी डीओपीटी व यूपीएससी की सलाह लिए बिना। कासिफ बनाम भारत सरकार, ये केस चल रहा है। यहां तक कि सीएपीएफ में वेटनरी डॉक्टर को भी टाइम बाउंड पदोन्नति दी जा रही है।

डीओपीटी ने 2008-09 के दौरान आदेश जारी किया था

केंद्रीय सुरक्षा बलों में ओजीएएस यानी ‘आर्गेनाइज्ड ग्रुप ए सर्विस’ के तहत सेवा नियम बनाने के लिए डीओपीटी ने 2008-09 के दौरान आदेश जारी किए थे। सीआरपीएफ, बीएसएफ, सीआईएसएफ और दूसरी कई सेवाओं में सर्विस रूल्स नहीं बनाए गए। कॉडर अधिकारियों को समय पर गैर-कार्यात्मक वित्तीय उन्नयन (एनएफएफयू) और गैर-कार्यात्मक चयन ग्रेड (एनएफएसयू) का लाभ मिल जाए, इसके लिए आरआर यानी रिक्रूटमेंट रूल में भी संशोधन नहीं किया गया। इस वजह से आज बहुत से कैडर अधिकारी प्रमोशन और आर्थिक फायदों से वंचित हैं। विभिन्न अर्धसैनिक बलों के करीब दस हजार कैडर अफसर प्रमोशन को लेकर परेशान हैं। इनमें सहायक कमांडेंट से लेकर आईजी रैंक तक के अधिकारी शामिल हैं। जिस तरह से केंद्र सरकार की दूसरी संगठित सेवाओं में एक तय समय के बाद रैंक या फिर उसके समकक्ष वेतन मिलता है, वैसा सभी केंद्रीय सुरक्षा बलों के अधिकारियों को नहीं मिल पा रहा है। करीब बीस साल की सेवा के बाद आईपीएस अधिकारी आईजी बन जाता है, लेकिन कैडर अफसर उस वक्त कमांडेंट के पद तक नहीं पहुंच पाता।

कैडर अफसर 33 साल की नौकरी के बाद बड़ी मुश्किल से आईजी बनता है। सीआरपीएफ के रिटायर्ड आईजी वीपीएस पवार और एसएस संधू का कहना है, सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2019 में कैडर अफसरों के पक्ष में फैसला सुनाया था। तीन साल हो गए हैं, लेकिन फैसला अभी तक लागू नहीं हुआ। नतीजा, कुछ युवा अफसर कोर्ट में चले गए तो अधिकांश अधिकारियों ने सेवा छोड़ने का मन बना लिया।

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नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में माओवादियों के ठिकाने पर पहुंच कर उन्हें तबाह करना, जम्मू-कश्मीर में आतंकियों के खिलाफ रोजाना हो रहे ‘ऑपरेशन’ और उत्तर-पूर्व में उग्रवादियों पर नकेल कसना, इन सभी में सीआरपीएफ के जांबाज ग्राउंड कमांडरों की अहम भूमिका है। इसके बावजूद केंद्र सरकार, इनके साथ सौतेला व्यवहार कर रही है। नतीजा, सीआरपीएफ के युवा अफसर, आठ-दस साल बाद फोर्स को अलविदा कह रहे हैं। पिछले 5/6 साल में 150 से अधिक सीधे नियुक्त राजपत्रित अधिकारियों ने नौकरी छोड़ दी है। हैरानी की बात तो ये है इन अधिकारियों को अपने हितों के लिए सर्वोच्च अदालत का सहारा लेना पड़ रहा है। ‘पहचान और पदोन्नति’ के मामले, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। कई मामले तो ऐसे हैं, जो कोर्ट की अवमानना के लिए दायर किए गए हैं। केंद्र सरकार ने अदालत के आदेश के बावजूद, ‘संगठित सेवा’ का दर्जा देने जैसे कई फैसलों को जानबूझकर लागू ही नहीं किया।

कमांडरों को इसलिए काटने पड़े अदालतों के चक्कर

कुछ दिन पहले ही सेवा को अलविदा बोल चुके सहायक कमांडेंट सर्वेश त्रिपाठी बताते हैं, सीआरपीएफ व दूसरे बलों में सीधे नियुक्त राजपत्रित अधिकारियों को कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। बात केवल पदोन्नति या दूसरे आर्थिक फायदों की नहीं है। यहां तो ‘पहचान’ के लिए लड़ना पड़ रहा है। सीएपीएफ में मेडिकल कैडर, मिनिस्ट्रियल और यहां तक की वेटनरी डॉक्टर को भी समय पर पदोन्नति मिल जाती है, मगर एग्जीक्यूटिव कैडर के साथ हर मामले में भेदभाव होता है। सीआरपीएफ के एमटेक, बीटेक, आईआईटी व दूसरी डिग्री हासिल किए अधिकारियों को पदोन्नति से वंचित रखा जा रहा है। पॉलिसी के मोर्चे पर सरकार के निर्णय ठीक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने संगठित सेवा ‘ओजीएएस’ देने का आदेश दिया। तत्कालीन केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने यह घोषणा करने के लिए बाकायदा प्रेसवार्ता की थी। केंद्रीय कैबिनेट ने नोटिफाई किया, लेकिन आज तक लागू नहीं किया गया। जब ये नहीं हुआ तो नए सर्विस रूल्स भी नहीं बने। ऐसे में एग्जीक्यूटिव कैडर को पदोन्नति कैसे मिल सकती है। ये अलग बात है कि केंद्र सरकार ने 2019 के लोकसभा चुनाव में ‘ओजीएएस’ देने के मुद्दे को खूब भुनाया था।  

‘पहचान’ के लिए अदालत में जाना पड़ा …  

हर सर्विस का एक नाम होता है। संबंधित कैडर अधिकारी उससे पहचाने जाते हैं। हैरानी की बात तो ये है कि सीआरपीएफ के युवा अधिकारियों को इसके लिए भी अदालत जाना पड़ा। चूंकि ये क्लास वन अधिकारी हैं, इसलिए अपनी सेवा का एक नाम चाहते हैं। आखिर ये किस सेवा में हैं, यह पता होना चाहिए। जैसे अखिल भारतीय सेवा में रेवेन्यू सर्विस, इंजीनियरिंग सर्विस या रेलवे की कई सेवाएं, सीआरपीएफ का भी एक ऐसा ही नाम चाहते थे। इसके लिए दिल्ली हाईकोर्ट में जाना पड़ा। केस अभी तक चल रहा है।  

आरपीएफ और सीआरपीएफ का एक जैसा ही केस था। आरपीएफ को आईआरपीएफएस नाम दे दिया गया। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सीआरपीएफ को नाम नहीं दिया। पुरानी पेंशन व्यवस्था भी अब खत्म हो चुकी है। करियर प्रोग्रेसन की स्थिति बहुत खराब है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी संगठित सेवा का दर्जा न मिलना और न ही एनएफएफयू को सही तरीके से लागू करना, इन सभी में सरकारी की मनमानी रही है। सीनियर्स द्वारा गैर जरूरी दबाव डाला जाता है। बल में साथ काम कर रहे मेडिकल कैडर और मंत्रालयिक शाखा के अधिकारियो को तुलनात्मक रूप से तेज प्रमोशन मिल रहा है। हर छोटे देय भत्ते जैसे एचआरए, टीए आदि के लिए न्यायालय की शरण में जाना पड़ रहा है।

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इन जांबाजों ने उठाई हक के लिए आवाज

सेवा का नाम, बैच का निर्धारण, सरकार ने इस बाबत कोई निर्णय नहीं लिया। सर्वेश त्रिपाठी बनाम भारत सरकार, ये मामला अदालत में चल रहा है। स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एचआरए के लिए भी अधिकारियों को कोर्ट की शरण लेनी पड़ी। गौरव सिंह बनाम भारत सरकार, यह केस अदालत में पहुंचा है। नॉन फंक्शनल सेलेक्शन ग्रेड (एनएफएसजी) के लिए करुणा निधान बनाम भारत सरकार, यह अवमानना का केस दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष विचाराधीन है। गैर-कार्यात्मक वित्तीय उन्नयन (एनएफएफयू) के केस में अदालत की अवमानना, यह केस भी सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है। ओजीएएस यानी संगठित सेवा का मामला भी अदालत में है।

सीआरपीएफ में डॉक्टरों को तेज पदोन्नति और एग्जीक्युटिव अधिकारियों को कछुआ गति से आगे बढ़ाना, ये केस अदालत के समक्ष है। आरोप है कि डॉक्टरों को टाइम बाउंड पदोन्नति मिल रही है। वे एक समय के बाद मनमर्जी से रैंक लगा लेते हैं। रणजीत सिंह बनाम भारत सरकार, ये केस अदालत में है। कैडर अधिकारियों का कहना है कि मिनिस्ट्रयल स्टाफ को क्लास वन अधिकारी बना रहे हैं वो भी डीओपीटी व यूपीएससी की सलाह लिए बिना। कासिफ बनाम भारत सरकार, ये केस चल रहा है। यहां तक कि सीएपीएफ में वेटनरी डॉक्टर को भी टाइम बाउंड पदोन्नति दी जा रही है।

डीओपीटी ने 2008-09 के दौरान आदेश जारी किया था

केंद्रीय सुरक्षा बलों में ओजीएएस यानी ‘आर्गेनाइज्ड ग्रुप ए सर्विस’ के तहत सेवा नियम बनाने के लिए डीओपीटी ने 2008-09 के दौरान आदेश जारी किए थे। सीआरपीएफ, बीएसएफ, सीआईएसएफ और दूसरी कई सेवाओं में सर्विस रूल्स नहीं बनाए गए। कॉडर अधिकारियों को समय पर गैर-कार्यात्मक वित्तीय उन्नयन (एनएफएफयू) और गैर-कार्यात्मक चयन ग्रेड (एनएफएसयू) का लाभ मिल जाए, इसके लिए आरआर यानी रिक्रूटमेंट रूल में भी संशोधन नहीं किया गया। इस वजह से आज बहुत से कैडर अधिकारी प्रमोशन और आर्थिक फायदों से वंचित हैं। विभिन्न अर्धसैनिक बलों के करीब दस हजार कैडर अफसर प्रमोशन को लेकर परेशान हैं। इनमें सहायक कमांडेंट से लेकर आईजी रैंक तक के अधिकारी शामिल हैं। जिस तरह से केंद्र सरकार की दूसरी संगठित सेवाओं में एक तय समय के बाद रैंक या फिर उसके समकक्ष वेतन मिलता है, वैसा सभी केंद्रीय सुरक्षा बलों के अधिकारियों को नहीं मिल पा रहा है। करीब बीस साल की सेवा के बाद आईपीएस अधिकारी आईजी बन जाता है, लेकिन कैडर अफसर उस वक्त कमांडेंट के पद तक नहीं पहुंच पाता।

कैडर अफसर 33 साल की नौकरी के बाद बड़ी मुश्किल से आईजी बनता है। सीआरपीएफ के रिटायर्ड आईजी वीपीएस पवार और एसएस संधू का कहना है, सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2019 में कैडर अफसरों के पक्ष में फैसला सुनाया था। तीन साल हो गए हैं, लेकिन फैसला अभी तक लागू नहीं हुआ। नतीजा, कुछ युवा अफसर कोर्ट में चले गए तो अधिकांश अधिकारियों ने सेवा छोड़ने का मन बना लिया।

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